Tumhara Prem

कभी चाँद के साथ
अकेली खिड़की पे बैठता हूँ
और एकटक देखता हूँ …

अँधेरी पेड़ों को 
धरती और आकाश के बीच झूलते हुए
ख्यालों में,

भक्कक्क से…..
तुम प्रकट हो जाती हो
और एक जोड़ी आँखों की स्माइल
जैसे रोशनी बन के
धरती पे बरसने लगती है
पेड़ों में जैसे ऊर्जा बहने लगती है
और अकेली खिड़की भी
कविता कहने लगती है …

कुछ अजीब सा है तुम्हारा प्रेम

नागराज और ध्रुव के जैसा
वर्षा और हर्षवर्धन के जैसा
अमृता और इमरोज़ के जैसा

हाँ …

हंसी और ख़ामोशी
दोनों से लबरेज है
तुम्हारा प्रेम

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